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7 दिसंबर 2015

नवगीत महोत्सव - २०१५ का सफल आयोजन

लखनऊ,  २१ तथा २२ नवम्बर २०१५ को, अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा गोमती नगर में स्थित कालिन्दी विला की दसवीं मंजिल पर नवगीत-महोत्सव का सफल आयोजन किया गया। नवगीत को केन्द्र में रखकर आयोजित होने वाला यह उत्सव सुरुचि, सादगी और वैचारिक संपन्नता के लिये जाना जाता है। नवगीत  की पाठशाला के नाम से वेब पर नवगीतों के विकास में संलग्न अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा आयोजित शृंखला का यह पाँचवाँ कार्यक्रम था।


नवगीत समारोह का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। गीतिका वेदिका द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना के उपरान्त पूर्णिमा वर्मन की माता जी श्रीमती सरोजप्रभा वर्मन और नवगीत समारोह के सदस्य श्रीकान्त मिश्र कान्त को विनम्र श्रद्धांजलि देकर उनकी स्मृतिशेष को नमन किया गया। विभिन्न नवगीतों पर रोहित रूसिया, विजेन्द्र विज, अमित कल्ला और पूर्णिमा वर्मन द्वारा बनायी गयी नवगीतों पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी को सभी ने देखा और सराहा।  

प्रथम सत्र में नवगीत की पाठशाला से जुड़े नये रचनाकारों द्वारा अपने दो दो नवगीत प्रस्तुत किये गये। नवगीत पढ़ने के बाद प्रत्येक के नवगीत पर वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा टिप्पणी की गई इससे नये रचनाकारों को अपनी रचनाओं को समझने और उनमें यथोचित सुधार का अवसर मिलता है। गीतिका वेदिका के नवगीतों पर रामकिशोर दाहिया ने टिप्पणी की, शुभम श्रीवास्तव ओम के नवगीतों पर संजीव वर्मा सलिल ने अपनी टिप्पणी की, रावेन्द्र कुमार रवि के नवगीतों पर राधेश्याम बंधु द्वारा टिप्पणि की गई, इसी प्रकार रंजना गुप्ता, आभा खरे, भावना तिवारी और शीला पाण्डेय के नवगीतों पर क्रमशः डा० रणजीत पटेल, गणेश गम्भीर, मधुकर अष्ठाना एवं राधेश्याम बंधु द्वारा टिप्पणी की गई।

इस मध्य कुछ अन्य प्रश्न भी नये रचनाकारों से श्रोताओं द्वारा पूछे गये जिनका उत्तर वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा दिया गया। प्रथम सत्र के अन्त में डा० रामसनेही लाल शर्मा यायावर ने नवगीत की रचना प्रक्रिया पर विहंगम दृष्टि डालते हुये बताया कि ऐसा क्या है जो नवगीत को गीत से अलग करता है। डा० यायावर ने अपनी नवगीत कोश योजना की भी जानकारी देते हुए बताया कि वे विश्व विद्यालय अनुदान आयोग की अति महत्त्वपूर्ण योजना के अन्तर्गत नवगीत कोश का कार्य शुरू करने जा रहे हैं जो लगभग एक वर्ष में पूरा हो जाएगा।

दूसरे सत्र में वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा अपने प्रतिनिधि नवगीतों का पाठ किया गया ताकि नये रचनाकार नवगीतों के कथ्य, लय, प्रवाह, छन्द आदि को समझ सकें। नवगीत पाठ के बाद सभी को प्रश्न पूछने की पूरी छूट दी गई जिसका लाभ नवगीतकारों ने उठाया। इस सत्र में सर्व श्री योगेन्द्र दत्त शर्मा [गाजियाबाद, उ.प्र.], डा० विनोद निगम [होशंगाबाद, म.प्र.], राधेश्याम बंधु [दिल्ली], गणेश गम्भीर [मिर्जापुर, उ.प्र.], डा० भारतेन्दु मिश्र [दिल्ली], रामकिशोर दाहिया [कटनी, म. प्र.], डा० मालिनी गौतम [संतनगर, गुजरात], डा० रणजीत पटेल [मुजफ्फरपुर, बिहार], वेदप्रकाश शर्मा [गाजियाबाद, उ.प्र.], डा० रामसनेहीलाल शर्मा यायावर [फीरोजाबाद], मधुकर अष्ठाना [लखनऊ] ने अपने प्रतिनिधि नवगीतों का पाठ किया।

तीसरे सत्र में सम्राट राजकुमार के निर्देशन में विभिन्न कलाकारों ने नवगीतों की संगीतमयी प्रस्तुति की। गिटार पर स्वयं सम्राट राजकुमार, तबले पर सिद्धांत सिंह, की बोर्ड पर मयंक सिंह और ढोलक पर अरुण मिश्रा ने संगत की। कार्यक्रम का आरंभ आशीष और सौम्या की गणेशवंदना से हुआ। गीतिका वेदिका, श्रुति जायसवाल एवं अन्य कलाकारों द्वारा नवगीतों पर आधारित नाटक प्रस्तुत किया गया। संगीत के कार्यक्रम में प्रतिमा योगी के स्वर में तारादत्त निर्विरोध का गीत 'धूप की चिरैया' बहुत ही कर्णप्रिय रहा।  पूर्णिमा वर्मन के गीत चोंच में आकाश और मंदिर दियना बार को क्रमशः ममता जायसवाल और मयंक सिंह ने स्वर दिया। रोहित रूसिया के स्वर में नईम का गीत चिट्ठी-पत्री और स्वयं उनका गीत 'उड़ गई रे' भी बहुत पसंद किया गया। रोहित रूसिया ने अपनी विशिष्ट सरस शैली में गायन से यह सिद्ध कर दिया कि नवगीतों की प्रस्तुति कितनी मनमोहक और प्रभावशाली हो सकती है। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण सुवर्णा दीक्षित द्वारा नरेन्द्र शर्मा के गीत नाच रे मयूरा पर आधारित कत्थक नृत्य रहा। नवगीत पर आधारित कत्थक का यह संभवतः पहला प्रयोग था।  इसके बाद अमित कल्ला तथा विजेन्द्र विज़ द्वारा निर्मित नवगीतों पर आधारित लघु फिल्में भी दिखायी गईं। 

दूसरे दिन का पहला और कार्यक्रम का चौथा सत्र अकादमिक शोधपत्रों के वाचन का था। पहला शोधपत्र कल्पना रामानी ने पढ़ा। यह शोधपत्र कुमार रवीन्द्र के नवगीत संग्रह 'पंख बिखरे रेत पर' के विषय में था। शीर्षक था '' 'पंख बिखरे रेत पर' में धूप की विभिन्न छवियाँ''। दूसरा शोध पत्र शशि पुरवार द्वारा निर्मल शुक्ल के नवगीत संग्रह "एक और अरण्यकाल" पर तैयार किया गया था। शीर्षक था ''मुहावरों का मुक्तांगन 'एक और अरण्यकाल' ''। दोनो आलेख सरस, रोचक और भरपूर परिश्रम के साथ लिखे हुए मालूम होते थे। इन दोनों शोधपत्रों को भरपूर सराहा गया। अन्त में गुजरात विद्यापीठ से पधारी विदुषी, गुजराती भाषा एवं साहित्य विभाग की विभागाध्यक्ष डा० उषा उपाध्याय ने "वर्ष २००० के बाद गुजराती गीतों की वैचारिक पृष्ठभूमि" पर लम्बा व्याख्यान प्रस्तुत किया जो बहुत प्रभावशाली रहा। डा० उषा उपाध्याय ने गुजराती गीतों के विविध अंशों को उदाहरण के रूप में रखकर बताया कि किस प्रकार गुजरात के ''सांप्रत गीतों'' (समकालीन गीत) की संवेदना नवगीत के निकट है।

पाँचवा सत्र २०१४ में प्रकाशित नवगीत संग्रहों की समीक्षा पर केन्द्रित सत्र रहा। इस सत्र का उद्देश्य साल भर में प्रकाशित नवगीत संग्रहों-संकलनों का लेखा जोखा करना तथा उपस्थित श्रोताओं में उनका परिचय प्रस्तुत करना होता है। साथ ही इसमें नवगीत संग्रहों का लोकार्पण भी होता है। डॉ. जगदीश व्योम द्वारा संचालित सत्र में उन २४ नवगीत संग्रहों का उल्लेख किया जिनका प्रकाशन २०१४ में हुआ था इसके बाद रजनी मोरवाल के नवगीत संग्रह "अँजुरी भर प्रीति" पर कुमार रवीन्द्र की लिखी गई भूमिका को ब्रजेश नीरज ने प्रस्तुत किया। जयकृष्ण राय तुषार के नवगीत संग्रह "सदी को सुन रहा हूँ मैं" पर शशि पुरवार ने समीक्षा प्रस्तुत की, अश्वघोष के नवगीत संग्रह "गौरैया का घर खोया है" तथा राघवेन्द्र तिवारी के नवगीत संग्रह "जहाँ दरक कर गिरा समय भी" पर डा० जगदीश व्योम ने समीक्षा प्रस्तुत की, रामशंकर वर्मा के नवगीत संग्रह "चार दिन फागुन के" पर मधुकर अष्ठाना ने समीक्षा प्रस्तुत की, रामकिशोर दाहिया के नवगीत संग्रह "अल्लाखोह मची" पर संजीव वर्मा सलिल द्वारा तथा विनय मिश्र के नवगीत संग्रह "समय की आँख नम है" पर मालिनी गौतम द्वारा समीक्षा प्रस्तुत की गई। इस सत्र में चार नवगीत संग्रहों- "अल्लाखोह मची"- रामकिशोर दाहिया, "झील अनबुझी प्यास की" - डा० रामसनेही लाल शर्मा यायावर, "चार दिन फागुन के" - रामशंकर वर्मा तथा "कागज की नाव" - राजेन्द्र वर्मा, का लोकार्पण किया गया। सत्र के बाद सभी का सामूहिक चित्र लिया गया।

छठे सत्र में नवगीतकारों को अभिव्यक्ति विश्वम् के नवांकुर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष उस रचनाकार के पहले नवगीत-संग्रह की पांडुलिपि को दिया जाता है, जिसने अनुभूति और नवगीत की पाठशाला से जुड़कर नवगीत के अंतरराष्ट्रीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। पुरस्कार में ११,००० भारतीय रुपये, एक स्मृति चिह्न और प्रमाणपत्र प्रदान किये जाते हैं। आयोजन में २०१५ का नवांकुर पुरस्कार संजीव वर्मा सलिल को तथा २०१४  का नवांकुर पुरस्कार ओमप्रकाश तिवारी को प्रदान किया गया। ओम प्रकाश तिवारी ने अनुपस्थित रहने के कारण यह पुरस्कार एक सप्ताह बाद ग्रहण किया जबकि कल्पना रामानी ने पिछले साल अनुपस्थित रहने के कारण २०१२ का स्मृति चिह्न एवं प्रशस्ति पत्र इस वर्ष ग्रहण किया।

पुरस्कार वितरण के बाद कवित सम्मेलन सत्र की विशिष्ट अतिथि डॉ. उषा उपाध्याय ने अपने गुजराती गीतों के हिंदी अनुवाद के साथ साथ एक मूल रचना का भी पाठ किया। गीत की लय कथ्य ने सभी उपस्थित रचनाकारों को आनंदित किया। इसके बाद सभी उपस्थित रचनाकारों ने अपने एक एक नवगीत का पाठ किया। इस अवसर पर उपस्थित प्रमुख रचनाकार थे- लखनऊ से संध्या सिंह, आभा खरे, राजेन्द्र वर्मा, डंडा लखनवी, डॉ. प्रदीप शुक्ल, रंजना गुप्ता, चन्द्रभाल सुकुमार, राजेन्द्रशुक्ल राज, अशोक शर्मा, डॉ. अनिल मिश्र, निर्मल शुक्ल, महेन्द्र भीष्म, मधुकर अष्ठाना और रामशंकर वर्मा, कानपुर से मधु प्रधान और शरद सक्सेना, छिंदवाड़ा से रोहित रूसिया और सुवर्णा दीक्षित, मीरजापुर से शुभम श्रीवास्तव ओम और गणेश गंभीर, बिजनौर से अमन चाँदुपुरी, दिल्ली से भारतेन्दु मिश्र और राधेश्याम बंधु, नॉयडा से डॉ जगदीश व्योम और भावना तिवारी, संतनगर गुजरात से मालिनी गौतम, गाजियाबाद से वेदप्रकाश शर्मा वेद और योगेन्द्रदत्त शर्मा, वर्धा से शशि पुरवार, मुंबई से कल्पना रामानी, कटनी से रामकिशोर दाहिया, खटीमा से रावेंद्रकुमार रवि, जबलपुर से संजीव वर्मा सलिल, इंदौर से गीतिका वेदिका, फीरोजाबाद से डॉ. राम सनेहीलाल शर्मा यायावर, मुजफ्फरपुर से डॉ. रणजीत पटेल, शारजाह से पूर्णिमा वर्मन, होशंगाबाद से डॉ विनोद निगम आदि। विभिन्न सत्रों का संचालन डा० जगदीश व्योम तथा रोहित रूसिया ने किया। अन्त में पूर्णिमा वर्मन तथा प्रवीण सक्सेना ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

25 नवंबर 2014

नवगीत महोत्सव - २०१४


लखनऊ में नवगीत को केन्द्र में रखकर दो दिवसीय कार्यक्रम १५ तथा १६ नवम्बर २०१४ को गोमती नगर के कालिन्दी विला में स्थित अभिव्यक्ति विश्वम के सभाकक्ष एवं उन्मुक्तांगन में सम्पन्न हुआ। नवगीत की पाठशाला के नाम से वेब पर नवगीत का अनोखे ढँग से प्रचार-प्रसार करने में प्रतिबद्ध अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की अनेक विशेषताएँ इसे अन्य साहित्यिक कार्यक्रमों से अलग करती हैं।


आयोजन के प्रथम दिन के प्रथम सत्र में देश भर से आमंत्रित कुल आठ नवोदित रचनाकारों के दो-दो नवगीतों का पाठ हुआ। इस सत्र में पवन सिंह, सुवर्णा दीक्षित, विजेन्द्र विज, प्रदीप शुक्ल, सीमा शर्मा, हरिशर्मा, संजीव सलिल ने अभिव्यक्ति के मंच से पहली बार अपनी रचनाओं का पाठ किया। जिस पर वरिष्ठ नवगीतकारों के एक समूह, जिसके सदस्य कुमार रवीन्द्र, राम सेंगर, धनन्जय सिंह, बृजेश श्रीवास्तव, पंकज परिमल थे, ने अपनी राय रखी। 

इस अवसर पर श्रद्धेय कुमार रवीन्द्र जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में नवगीत में नवता को लेकर व्याप्त भ्रम को दूर करते हुए कहा कि शाब्दिकता तथा संप्रेषणीयता के बीच तारतम्यता के न टूटने देने के प्रति आग्रही होना नवगीतकारों का दायित्व है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रद्धेय राम सेंगर जी ने नवगीत महोत्सव को उत्सव बताते हुए कहा है कि इस प्रकार की कार्यशालाएं युवा रचनाकारों के रचनात्मक व्यकितत्व के विकास तथा उनमें नवगीत की समझ बढाने में सहायक होंगी। इस सत्र का सफल संचालन जगदीश व्योम जी ने किया। इसी सत्र के दूसरे भाग में लब्धप्रतिष्ठित गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र का 'गीत और नवगीत में अंतर' शीर्षक पर व्याख्यान हुआ। आपका कहना था कि नवगीत का प्रादुर्भाव हुआ ही इसलिये था कि एक ओर हिन्दी कविता लगातार दुरूह होती जा रही थी, और दूसरी ओर हिन्दी साहित्य में शब्द-प्रवाह को तिरोहित किया जाना बहुत कठिन था। अतः नवगीत नव-लय-ताल-छंद और कथ्य के साथ सामने आया।

इसके पश्चात नवगीतों पर आधारित ५० पोस्टरों की एक प्रदर्शनी का उद्घाटन लखनऊ ललित कला महाविद्यालय के डीन पांडेय राजीव नयन द्वारा किया गया। उन्होंने भाग लेने वाले कलाकारों- पूर्णिमा वर्मन, रोहित रूसिया अमित कल्ला और विजेन्द्र विज के बनाए पोस्टरों की सराहना की, उन्मु्क्तांगन में रखे हुए कैनवस पर रेखाचित्र बनाया और अपने हस्ताक्षर किये। इसके बाद उपस्थित अतिथियों और रचनाकारों ने उस कैनवस पर अपने हस्ताक्षर किये, जिसे स्मृति चिह्न के रूप में सहेजा गया।

भोजन अवकाश के बाद कार्यक्रम के दूसरे सत्र में देश भर से आये वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा नवगीतों का पाठ हुआ। इस सत्र के प्रमुख आकर्षण रहे - श्रद्धेय कुमार रवीन्द्र, राम सेंगर, अवध बिहारी श्रीवास्तव, राम नारायण रमण, श्याम श्रीवास्तव, ब्रजेश श्रीवास्तव, शीलेन्द्र सिंह चौहान, डॉ मृदुल, राकेश चक्र, जगदीश पंकज एवं अनिल मिश्रा। कार्यक्रम के अध्यक्ष कुमार रवीन्द्र जी एवं मुख्य अतिथि राम सेंगर जी रहे। मंच संचालन अवनीश सिंह चौहान ने किया।


कार्यक्रम के प्रथम दिवस के तीसरे और अंतिम सत्र सांस्कृतिक संध्या का आयोजन खुले आँगन में किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ आशीष और सौम्या की गणपति वंदना से हुआ। पेड़ छतनार शीर्षक से एक नुक्कड़ नाटक खेला गया जिसे पूर्णिमा वर्मन ने लिखा और अमित कल्ला ने निर्देशित किया था भाग लेने वाले कलाकार थे- पवन प्रताप सिंह, सुवर्णा दीक्षित, रोहित रूसिया, रामशंकर वर्मा, अमित कल्ला तथा सौम्या। इस नाटक में यश मालवीय, कुमार रवीन्द्र, श्याम श्रीवास्तव, पूर्णिमा वर्मन, डॉ राजेन्द्र गौतम, निर्मल शुक्ल, श्याम निर्मम, सुरेन्द्र सुकुमार, कल्पना रामानी, पंकज परिमल, रामशंकर वर्मा, और राधेश्याम बंधु, के नवगीत, नवगीतों के अंश, कुछ पंक्तियाँ या कुछ पद्याशों का प्रयोग किया गया था। 

इसके बाद डॉ. शिव बहादुर भदौरिया के नवगीत "पुरवा जो डोल गई'' पर सृष्टि श्रीवास्तव ने कत्थक नृत्य प्रस्तुत किया। नवगीतों का गायन सम्राट राजकुमार, अमित कल्ला और रोहित रूसिया ने किया। पूरे कार्यक्रम में गिटार पर सम्राट राजकुमार, तबले पर सिद्धांत सिंह और रजत श्रीवास्तव तथा की बोर्ड पर मयंक सिंह ने संगत की। कार्यक्रम का अंत विजेन्द्र विज द्वारा नवगीतों पर बनाई गई छह लघु फिल्मों से हुआ।

दूसरे दिन के पहले सत्र में देश भर से गीति-काव्य के नवगीत विधा के मूर्धन्य विद्वानों ने इस विधा की वैधानिकता तथा इसके शिल्प पर प्रकाश डाला। विधा के विभिन्न विन्दुओं को समेटते हुए गीत और नवगीत में अंतर, नवगीत की दशा और दिशा, इसकी संरचना, इसके रचाव पर चर्चा की। डॉ. जगदीश व्योम ने नयी कविता तथा नवगीत के मध्य के अंतर को रेखांकित किया। रचनाओं के शिल्प में गेयता-लय की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि प्रस्तुतियों में छंदों और लय का अभाव हिन्दी रचनाओं के लिए घातक सिद्ध हुआ। कविताओं के प्रति पाठकों द्वारा अन्यमन्स्कता का मुख्य कारण यही रहा कि कविताओं से गेयता निकल गयी। कवितायें अनावश्यक रूप से बोझिल हो गयीं। 

डॉ. धनन्जय सिंह की उद्घोषणा इन अर्थों में व्यापक रही कि नवगीत संज्ञा नहीं वस्तुतः विशेषण है। आपने कहा कि आजकी मुख्य आवश्यकता शास्त्र की जड़ता मुक्ति है न कि शास्त्र की गति से मुक्ति। डॉ. धनन्जय सिंह के व्याख्यान का शीर्षक ’नवगीत की दशा और दिशा’ था। ’रचना के रचाव तत्त्व’ पर बोलते हुए डॉ. पंकज परिमल ने कहा कि शब्द, तुक, लय, प्रतीक मात्र से रचना नहीं होती, बल्कि रचनाकार को रचाव की प्रक्रिया से भी गुजरना होता है। रचाव के बिना कोई भाव शाब्दिक भले हो जायें, रचना नहीं हो सकते। आपने रचना प्रक्रिया में अंतर्क्रिया तथा अंतर्वर्ण की सोदाहरण व्याख्या की। प्रथम सत्र के आज के अन्य वक्ताओं में डॉ. मधुकर अष्ठाना तथा राम सेंगर प्रमुख थे। द्वितीय दिवस का यह सत्र कार्यशाला के तौर पर आयोजित हुआ था, जिसके अंतर्गत उद्बोधनों के बाद अन्यान्य नवगीतकारों द्वारा पूछे गये प्रश्नों के वक्ताओं ने समुचित उत्तर दिये।

भोजनावकाश के बाद दूसरे सत्र में विभिन्न प्रकाशनों से प्रकाशित कुल छः नवगीत-संग्रहों का लोकार्पण हुआ। जिसके उपरान्त विभिन्न विद्वानों ने समीक्षकीय चर्चा की। रोहित रूसिया के नवगीत-संग्रह ’नदी की धार सी संवेदनाएँ’ पर डॉ. गुलाब सिंह ने समीक्षा की। डॉ. गुलाब सिंह की अनुपस्थिति में उनका वक्तव्य वीनस केसरी ने पढ़कर सुनाया। वरिष्ठ गीतकार डॉ. महेन्द्र भटनागर के नये संग्रह ’दृष्टि और सृष्टि’ पर बृजेश श्रीवास्तव ने समीक्षा प्रस्तुत की। ओमप्रकाश तिवारी के नवगीत-संग्रह ’खिड़कियाँ खोलो’ पर सौरभ पाण्डेय ने समीक्षा प्रस्तुत की। यश मालवीय के संग्रह ’नींद काग़ज़ की तरह’ पर निर्मल शुक्ल ने समीक्षा प्रस्तुत की। तथा, निर्मल शुक्ल के नवगीत-संग्रह ’कुछ भी असंभव’ पर मधुकर अष्ठाना ने समीक्षा प्रस्तुत की। पूर्णिमा वर्मन के नवगीत-संग्रह ’चोंच में आकाश’ पर आचार्य संजीव सलिल ने समीक्षा प्रस्तुत की। सभी समीक्षकों ने नवगीत-संगहों भाव तथा शिल्प पक्षों पर खुल कर अपनी बातें कहीं। सत्र का संचालन डॉ. अवनीश सिंह चौहान किया।

तीसरे सत्र में आयोजन की परिपाटी के अनुसार सभी रचनाकारों ने अपनी-अपनी रचनाओं का पाठ किया. इस वर्ष के आमंत्रित कवियों में चेक गणराज्य से पधारे डॉ. ज्देन्येक वग्नेर विशेष कवि रहे। उनके अतिरिक्त इस सत्र में जयराम जय, पंकज परिमल, शैलेन्द्र शर्मा, ब्रजभूषण गौतम, वीरेन्द्र आस्तिक, निर्मल शुक्ल, पूर्णिमा वर्मन, डॉ. जगदीश व्योम, वीनस केसरी, रोहित रूसिया, डॉ. प्रदीप शुक्ला, रामशंकर वर्मा, मधु प्रधान, संध्या सिंह, अवनीश सिंह चौहान, ब्रजेश श्रीवास्तव, कुमार रवीन्द्र, कमलेश भट्ट कमल, शरद सक्सेना, आभा खरे, सौरभ पांडे, चंद्रभाल सुकुमार, अनिल वर्मा आदि ने अपनी रचनाओं का पाठ किया।

नवगीत पाठ के पूर्व अभिव्यक्ति-अनुभूति संस्था की ओर से नवगीत नवांकुर पुरस्कार का वितरण किया गया। अवनीश सिंह चौहान को उनके नवगीत संग्रह ’टुकड़ा काग़ज़ का’ के लिये २०११ का, कल्पना रामानी को उनके नवगीत संग्रह ’हौसलों के पंख’ के लिये २०१२ का तथा रोहित रूसिया को उनके नवगीत संग्रह ’नदी की धार सी संवेदनाएँ’ के लिए २०१३ का नवगीत नवांकुर पुरस्कार दिया गया। विद्वानों द्वारा नवगीत विधा के बहुमुखी विकास की संभावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ ही ’नवगीत महोत्सव २०१४’ का समापन हुआ।